- सुभाष गाताडे
याद रहे कि देश में वैज्ञानिक चिन्तन के प्रति प्रतिबद्धता जारी रखने के लिए संसद ने साठ साल पहले संविधान में धारा 51 ए को जोड़ा है, जो राज्य पर वैज्ञानिक एवं तार्किक सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी डालता है, जो धारा 51 ए /एच/ में स्पष्ट करती है कि यह सभी नागरिकों की बुनियादी जिम्मेदारी होगी कि 'वह वैज्ञानिक चिन्तन, मानवता और अनुसंधान को विकसित करेंगे।' मगर उसी मुल्क की अलग-अलग विधानसभाओं में या उसके सदस्यों में भूत-प्रेत की सायाओं की चर्चा सरेआम जारी है।
कुछ साल पहले, पाकिस्तान के जाने-माने भौतिकीविद प्रो. परवेज हुदभॉय- जो प्रख्यात मानवाधिकर कार्यकर्ता भी हैं- उनके एक लेख ने सुर्खियां पाई थी जिसमें उन्होंने 'जिन्नों के शिक्षा संस्थानों के परिसरों में पहुंचने' की बात की थी और बताया था कि उनके मुल्क के शिक्षा संस्थानों में किस तरह ऐसे 'प्रेरक वक्ताओं' की शोहरत बढ़ रही है जो पैरानॉर्मल अर्थात भूत-प्रेत संबंधी जानकारी होने का दावा करते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह पाकिस्तान के अग्रणी संस्थानों में विज्ञान विरोधी और तर्कशीलता विरोधी आवाज़ें मजबूती हासिल कर रही हैं, जहां पर भी ऐसे 'विशेषज्ञों' को बुलाया जाता है। उधर सरहद पर अगर शिक्षा संस्थानों में पैरानॉर्मल गतिविधियों की चर्चा आम हो रही है तो सरहद के इस पार के शिक्षा संस्थान भी शायद उसी नक्शेकदम पर चलते दिख रहे हैं। सूबा मध्यप्रदेश के एक मेडिकल कॉलेज को ही देखें जो सरकार द्वारा संचालित हैं, वहां सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा मांगी गई सूचनाओं को दे पाने में अपनी कथित असमर्थता की वजह के तौर पर भी भूत का हवाला दिया जा रहा है।
अभी कुछ दिन पहले ही ख़बर आई कि यहां के प्रवेशों में हुई कथित अनियमितताओं की जांच में मुब्तिला इन कार्यकर्ताओं ने प्रवेश के पुराने रेकार्ड मांगने चाहे तो कॉलेज प्रशासन ने उनके सामने कई बहाने पेश किए। पहले कहा कि इन दस्तावेजों को सीबीआई अपने छापे में ले गई है, बाद में उन्होंने कहा कि जो क्लर्क इन रेकार्ड को देखता था, उसी ने आत्महत्या कर ली है और अब कहा जा रहा है कि जिस क्लर्क ने आत्महत्या की थी, उसी का भूत उस रेकार्ड रूम में घूमता है और जिसकी वजह से रेकार्ड उपलब्ध करना मुश्किल है। निश्चित ही भूत से कथित तौर पर कथित तौर पर आतंकित यह सरकारी मेडिकल कॉलेज इस मामले में अपवाद नहीं कहा जा सकता।
आप यह भी कह सकते हैं कि प्रबंधन के लोग अपने सियासी कर्णधारों द्वारा दिखाए रास्ते पर ही चल रहे हैं। कुछ साल पहले की बात है मध्यप्रदेश विधानसभा में तो बाकायदा इस पर चर्चा शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन शुरू हुई थी। 14 वीं विधानसभा के चार सालों में कुल 9 सदस्यों के असमय निधन की चर्चा करते हुए विधानसभा के सदस्यों ने विधानसभा भवन में 'वास्तुदोष' की चर्चा की और सरकार से बाकायदा कहा कि वह यह पता कर लें कि कहीं इस भवन में किसी तरह की 'बाधा' तो नहीं है। किसी ने कांग्रेस के एक विधायक गोविंद सिंह- जो तर्कशील हैं- द्वारा उठाए इस प्रश्न का जवाब नहीं दिया कि आखिर कोई इमारत किसी के जीवन या मरण को किस तरह प्रभावित कर सकती है। उन्हें इस बात के प्रति भी कोई सरोकार नहीं था कि उस खुबसूरत इमारत का डिजाइन मशहूर आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरिया ने किया है। किसी ने यह भी याद दिलाया कि इसी विधानसभा में को सीहोर जिले में हुई आत्महत्याओं पर प्रस्तुत सवाल के लिखित उत्तर में सरकार ने बताया था कि इन आत्महत्याओं में से 'कुछेक लोगों ने भूत-प्रेत के कारणों से आत्महत्या की है।'
वैसे इस मामले में बहस उन्हीं दिनों बिल्कुल अलग ऊंचाइयों पर पहुंची थी जब राजस्थान विधानसभा में कुछ सदस्यों ने बाकायदा कहा कि 'विधानसभा में बुरी आत्माओं का साया है। तभी तो आज तक सदन में 200 विधायक एक साथ नहीं रहे। कभी किसी की मौत हो जाती है, कभी किसी को जेल हो जाती है। आत्माओं की शांति के लिए हवन और पंडितों को भोजन कराने की जरूरत है।' बात यहां तक पहुंची कि एक कैबिनेट मंत्री ने कमेटी बना कर भूत-प्रेतों की जांच कराने की मांग की, यह सलाह भी दी कि रात के बारह बजे के बाद यहां पर चर्चा जारी न रखी जाए क्योंकि उसके बाद 'भूत-प्रेत विचरने लगते हैं' तो किसी अन्य सदस्य ने बाकायदा एक तांत्रिक को बुला कर चार घंटे तक उससे विधानसभा भवन का मुआयना करवाया और उससे सलाह ली।
वैसे राजस्थान, मध्यप्रदेश के अपने सहमना विधायकों के एक कदम आगे जाने का काम गुजरात के दो मंत्रियों के नाम दर्ज रहेगा, जो पिछली गुजरात सरकार में मंत्री थे। 2017 के मध्य में उनका एक विडियो वायरल हुआ था कि भरी सभा के सामने तांत्रिक अपना कारनामा दिखा रहे थे, पीछे संगीत की धुन चल रही थी, वह अपने को लोहे की जंजीरों से पीट रहे थे और जनता ही नहीं बल्कि सूबा गुजरात के उपरोक्त दोनों मंत्री उस नजारे को देख रहे हैं। बाद में दोनों मंत्री 'झाड़ फूंक करने वालों' के सम्मान समारोह में - जिसमें वह करीब सौ ओझाओं से हाथ मिलाते भी दिखे। बाद में जब हंगामा हुआ तो उन्होंने 'दैवी शक्ति के उपासकों'' से मिलने की बात कह कर अपना बचाव किया। गनीमत थी कि उनकी इस सहभागिता को लेकर दलितों और अन्य उत्पीड़ित तबकों ने विरोध किया, जिसमें उनका कहना था कि एक तरफ ग्रामीण गुजरात ऐसे हजारों तांत्रिकों/ ओझाओं के चंगुल में फंसे हैं - जो अंधश्रद्धा से युक्त तमाम कारनामों को अंजाम देते हैं - वहीं संविधान की कसमें खाए मंत्री उन्हें महिमामंडित करते हैं।
'भूत-प्रेत' और रूहों की बातें महज हिन्दी हार्टलेण्ड तक अर्थात हदयभूमि तक सीमित नहीं है। अरुणाचल को ही देखें जहां मुख्यमंत्री के लिए 60 करोड़ की लागत से बना आलीशान सीएम हाउस- जो ईटानगर की एक ऊंची पहाड़ी पर बनाया गया है - गेस्ट हाउस में तब्दील कर दिया गया है, और वह भी चन्द अफसरों के इस अवैज्ञानिक सोच से कि यहां 'शैतानी रूहों' ने निवास कर लिया है।
भूत-प्रेत पर यकीन या अंधश्रद्धा के मामले में सांसद सदस्य भी पीछे नहीं दिखते। मिसाल के तौर पर कुछ साल पहले संसद में चली चर्चा में एक तथ्य उजागर हुआ था कि वर्ष 2001 से संसद से महज आधा किलोमीटर दूरी पर बना एक सांसद आवास लगभग सूना पड़ा है। कोई भी सांसद उसमें रहना नहीं चाहता। वजह इसी आवास में सांसद रहते हुए फूलन देवी की हत्या हुई थी। जादू-टोना पर पाबन्दी विधेयक 2010 को लेकर संसद में चली चर्चा में यह तथ्य उजागर हुआ था।
याद रहे कि देश में वैज्ञानिक चिन्तन के प्रति प्रतिबद्धता जारी रखने के लिए संसद ने साठ साल पहले संविधान में धारा 51 ए को जोड़ा है, जो राज्य पर वैज्ञानिक एवं तार्किक सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी डालता है, जो धारा 51 ए /एच/ में स्पष्ट करती है कि यह सभी नागरिकों की बुनियादी जिम्मेदारी होगी कि 'वह वैज्ञानिक चिन्तन, मानवता और अनुसंधान को विकसित करेंगे।' मगर उसी मुल्क की अलग-अलग विधानसभाओं में या उसके सदस्यों में भूत-प्रेत की सायाओं की चर्चा सरेआम जारी है। आज की तारीख में जिस नए इंडिया में हम रहे हैं उसकी यह खासियत कही जा कती है कि उसने पुराने पूर्वाग्रहों को, असमावेशों और भेदभाव को ढूंढ निकाला है और जो बेहद तेजी के साथ अतार्किकता के रास्ते पर बढ़े चले जा रहा है।